स्वतंत्रता आंदोलन के बेमिसाल योद्धा वीर बांकुड़ा बाबू कुंवर सिंह 26 अप्रैल 1858 को अंतिम सफर पर निकल गये थे। दुनिया के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई योद्धा होगा, जो 80 वर्ष की उम्र में अपने अदम्य साहस, शौर्य व पराक्रम के साथ इतनी बड़ी शानदार शहादत दी हो। यही कारण है कि कुंवर सिंह की बलिदानी की गाथा को हमेशा याद किया जाता है। रविवार को महानायक कुंवर सिंह की पुण्यतिथि है। लेकिन कोरोना संकट में लगे लाॅकडाउन के कारण ऐतिहासिक नगरी जगदीशपुर में शहादत दिवस को खामोशी के साथ याद कर उन्हें नमन किया जाएगा।
गौरतलब हो कि 23 अप्रैल 1858 को वीर कुंवर सिंह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के शिवपुर घाट से कैप्टन ली ग्रांड की फौज को पराजित कर अपने जाँबाज सिपाहियों के साथ लौट रहे थे। कुंवर सिंह के गंगा नदी के रास्ते लौटने की भनक अंग्रेजों को लग गयी थी। इसके बाद अंग्रेजों ने गंगा नदी के दूसरे किनारे से हमला बोल दिया था। अंग्रेजों द्वारा किए गये अचानक हमले में संयोग से कुंवर सिंह के बांए हाथ में गोली लग गयी थी और वे गंभीर जख्मी हो गये थे। इसके बावजूद भी कुंवर सिंह ने हिम्मत नहीं हारी थी।
उन्होंने अपने अदम्य साहस व बलिदान की दास्तान दिखाते हुए 80 वर्ष की उम्र में स्वयं तलवार से अपनी बाह काटकर गंगा मइया को अर्पित कर दिया था। इतना ही नहीं जख्मी हालत में ही वे 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर पहुंचे थे और उसी दिन यूनियन जैक उतार कर विजयोत्सव मनाया था। विजय दिवस समारोह के 3 दिन बाद 26 अप्रैल 1858 को कुंवर सिंह ने आंखें मूंद ली थी और हमेशा के लिए अमर हो गये।
वर्ष 2018 में आयोजित तीन दिवसीय विजयोत्सव समारोह के दौरान ऐतिहासिक शिवपुर गंगा घाट से शौर्य व पराक्रम की अद्भुत, अद्वितीय व भव्य व आकर्षक शोभायात्रा निकाली गयी थी। सरकारी स्तर पर इलाके में निकलने वाली यह पहली शोभायात्रा थी, जिसका दीदार करने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। पिछले 23 अप्रैल 2018 को यह पहला अवसर था, जब ऐतिहासिक शिवपुर गंगा घाट से विजयोत्सव का आगाज किया गया।
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