कोटा में फंसे छात्रों की स्थिति धीरे-धीरे खराब होते जा रही है। खासकर यूपी के छात्रों के अपने-अपने घर चले आने के बाद से वहां रहने वाले छात्र अब धीरे-धीरे डिप्रेशन का शिकार होने लगे हैं। कोटा में रहने वाले गम्हरिया प्रखंड क्षेत्र के कई छात्र-छात्राओं ने फोन कर अपनी पीड़ा जताई है।
फोन पर अपने परिजनों को जानकारी देते रहने से अब उनके अभिभावक भी परेशान हो रहे हैं। कई छात्रों का कहना है कि डॉक्टर बनने का सपना टूटते जा रहा है। कल को वे डॉक्टर बन पाएंगे कि नहीं कहना मुश्किल है, लेकिन अगर वे और कुछ दिन कोटा में फंसे रहे तो वे मानसिक रोगी जरूर हो जाएंगे। कोई बिस्कुट खाते रहता है, तो कोई मैगी बना-बनाकर खा रहा है। टेरही निवासी अरुण राम का बेटा मेडिकल तैयारी के लिए कोटा में पढ़ता है। अरुण बताते है कि लॉकडाउन में उसे वहां काफी परेशानी हो रही है। जिस प्रकार यूपी, एमपी सहित अन्य राज्यों की सरकारों ने कोटा में पढ़ने वाले अपने राज्य के बच्चों को वापस लाया, उसी प्रकार बिहार सरकार भी यहां के बच्चों को वापस लाने का उपाय करे। कोटा में पढ़ने वाली गम्हरिया की अन्नु कुमारी कहती है कि हर किसी से गुहार लगा चुकी है। कोई नहीं सुनता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी विकट परिस्थिति में हमें परेशानी से मुक्त नहीं कर रहे हैं। 2 किलोमीटर दूर से खाना आ रहा है, यहां कितना सेफ होगा यह सोच कर डर लगता है। घर पर मम्मी-पापा अलग परेशान हैं।
खाना खाने लायक नहीं है, पता नहीं घर आ पाऊंगी भी की नहीं : माधुरी
माधुरी कुमारी कहती है कि टाइम पर खाना नहीं मिल रहा है। जो खाना मिल रहा है वह खाने लायक नहीं होता है। तनाव के कारण पढ़ने और खाने में मन नहीं लग रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे घर जाऊं। पता नहीं जा भी पाऊंगी की या नहीं। यूपी के छात्र हमलोगों के आंख के सामने अपने-अपने घर चले गए। हमारे लिए सरकार क्यों नहीं कुछ करती है। उसके पापा अजयचंद नायक कहते हैं कि उनकी इकलौती बच्ची जिस स्थिति में रह रही है, उसकी कल्पना कर मन सिहर उठता है। सरकार को इन बच्चों के लिए सोचना चाहिए। एक कमरे में पता नहीं किस तरह कैदी के रूप में रह रही होगी। खाना भी ढंग का नहीं मिल रहा, वह भी डिप्रेशन में है और हमलोग भी। सरकार ने इन बच्चों को प्रवासी मजदूरों की श्रेणी में रख दिया है।
हर दिन बढ़ रहे हैं मरीज, धीरे धीरे बढ़ रहा डिप्रेशन : नीतीश
टेरही के नीतीश कुमार का कहना है कि मेस से जो खाना आता है, उस खाना को खाने में भी डर बना रहता है। किस मेस के कर्मचारी पर विश्वास करें, समझ में नहीं आता है। यहां दिन-प्रतिदिन कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं। अब पानी भी सही तरह से फिल्टर होकर नहीं आ रहा है। यहां अब बिहार के ही छात्र बचे हुए हैं। तनाव के कारण पढ़ाई भी सही तरीका से नहीं हो रहा है। धीरे-धीरे डिप्रेशन भी बढ़ रहा है।
जान चली जाएगी तो मम्मी-पापा को कौन जवाब देगा : सोनू
गम्हरिया वार्ड एक निवासी कोटा में रहने वाले छात्र सोनू कुमार कहता है कि मेडिकल की तैयारी करने का सपना अब टूटता दिख रहा है। बिस्कुट व मैगी खाकर कब तक जान बचेगा, पता नहीं। जान चली जाएगी, तो मेरे मम्मी-पापा को कौन जवाब देगा। सोनू के पिता पवन साह कहते हैं कि बड़े-बड़े मंत्री और विधायक तो अपने बच्चे को कोटा से ले आए। लेकिन हमलोगों के बच्चों के बारे में सरकार कुछ नहीं
सोच रही है।
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