(राजू कुमार)कारखाना, होटल, घर सहित अन्य व्यवसाय से निकलने वाला गंदा पानी गंगा के पानी को दूषित कर रहा था। लॉकडाउन की वजह से अभी सब कुछ बंद है। इससे इन दिनाें गंगा नदी की निर्मलता देखते बनती है। यही कारण है कि डॉल्फिन गंगा में फल-फूल रही है। नदी में जहाज, बोट और मछुआरा नहीं होने के कारण डॉल्फिन घाटों के आस-पास आकर खेल-कूद रही है। यूपी बॉर्डर चौसा से कटिहार के मनिहारी तक डॉल्फिन की संख्या बढ़ गई है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक डॉ. गोपाल शर्मा ने बताया कि अगर इसी तरह करीब 3 माह तक गंगा में आवाजाही बंद रही तो डॉल्फिन की संख्या 20 फीसदी बढ़ जाएगी। डॉल्फिन मीठे पानी में रहती है। डॉल्फिन के बच्चे जहां-तहां काफी संख्या मेंं देखे गए हैं। अभी डॉल्फिन को खाने में दिक्कत नहीं हो रही है। नदी में गेहूंमा नाम की छोटी मछली काफी संख्या में है। 2018 में सर्वे हुआ था जिसमें बिहार करीब 1448 डॉल्फिन मिली थी।
जाल से हाे जाती थीं चोटिल
डॉल्फिन देख नहीं पाती है। आवाज की दिशा में ही भोजन के लिए दौड़ती है। इस कारण नाव या जाल के कारण चोटिल हो जाती थीं। गंगा में मानवीय गतिविधियों के कारण उन्हें सही से भोजन भी नहीं मिल पा रहा था। लेकिन लॉकडाउन की वजह से डॉल्फिन सुरक्षित महसूस कर रही है। लॉकडाउन के कारण मछुआरों का भी गंगा की ओर जाना बंद हो गया है। वे इसमें जाल नहीं डाल रहे हैं। नाव की आवाजाही बंद है। इस कारण डॉल्फिन स्वच्छंद विचरण कर रही हैं। उन्हें पर्याप्त भोजन भी मिल रहा है।
2 साल पहले हुआथा सर्वे
सरकार के तीन संगठनों ने गंगा और सहायक नदियाें में डॉल्फिन का सर्वे किया था। 18 नवंबर से 10 दिसंबर, 2018 के बीच पटना जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भागलपुर तिलका मांझी विश्वविद्यालय और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट द्वारा चले व्यापक सर्वेक्षण के दौरान गंगा में मोकामा से मनिहारी तक की 300 किलोमीटर लंबी सीमा में करीब 825 डॉल्फिन पता लगा था। बक्सर से मोकामा तक गंगा में करीब 365 और कोसी, गंडक व घाघरा में करीब 258 डॉल्फिन पाई गई।
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