महागठबंधन से हम और रालोसपा ने क्या इसलिए नाता तोड़ लिया कि राजद और कांग्रेस ने उनके कोटे के उम्मीदवारों को अपने सिम्बल (लालटेन व पंजा) पर चुनाव लड़ने की शर्त रख दी थी? ...सीटों की हिस्सेदारी या सम्मान कोई बड़ा मसला नहीं था? अंदरखाने की बात यह है कि हम और रालोसपा अपने प्रत्याशियों को राजद या कांग्रेस के सिम्बल पर मैदान में उतारने को तैयार नहीं हुईं और दोनों ने अलग राह पकड़ ली।
दरअसल, राजद-कांग्रेस ने यह शर्त ही इसलिए रखी कि चुनाव बाद दल-बदल या किसी दूसरे गठबंधन में जाने की संभावना खत्म हो जाए। वीआईपी महागठबंधन में ही रहेगी लेकिन उसे सीटें राजद के कोटे से मिलेंगी और उसके उम्मीदवार राजद के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतरेंगे। हम और रालोसपा के अलग हो जाने से महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीट शेयरिंग थोड़ी आसान हो गई है, क्योंकि दावेदार घट गए।
महागठबंधन: सीट शेयरिंग की घोषणा 2-3 अक्टूबर को संभव
महागठबंधन के बचे घटकों राजद-कांग्रेस-वाम दलों के बीच सीट शेयरिंग अब अंतिम दौर में है। और इसी सप्ताह 2-3 अक्टूबर को इसकी घोषणा भी हो जाएगी। हालांकि सूत्रों की मानें तो राजद-कांग्रेस के बीच अभी 10 सीटों पर तनातनी चल रही है। राजद 150 सीटें अपने खाते में चाहता है तो कांग्रेस अपनी हिस्सेदारी 70 या उससे पार ले जाना चाहती है।
ऐसे में वामदलों की हिस्सेदारी अधिकतम 25 सीटों की होगी। घटक दलों में जब सीट बंटवारे की बातचीत शुरू हुई तो 2015 विधानसभा चुनाव के फार्मूले को आधार बनाए जाने की संभावना थी। जदयू के कोटे की 101 सीटों के बंटवारे में राजद को 50, कांग्रेस को 30 और वामदलों को 20 सीटें मिलनी थीं। सीट शेयरिंग में कांग्रेस इस बार ज्यादा सतर्क है। फिर भी दोनों पार्टियां जानती हैं कि अलग-अलग लड़ने से दोनों को भारी नुकसान होगा।
कोई भी अकेले चुनाव नहीं जीत सकता : झा
बिहार कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन अविनाश पांडेय ने 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी। आज सदाकत आश्रम में धरना पर बैठे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. मदन मोहन झा ने उनकी राय से असहमति जता दी। उन्होंने कहा कि आज का दौर गठबंधन का है। देश का कोई भी दल अकेले चुनाव लड़ने का दावा नहीं कर सकता है।
जमीनी हकीकत समझे कांग्रेस : वीआईपी
मुकेश सहनी की नेतृत्व वाली वीआईपी अपने स्टैंड पर कायम है। महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ेगी। पार्टी प्रवक्ता राजीव मिश्र ने कहा कि जब राजद ने तेजस्वी को अपना नेता माना है, तो महागठबंधन के सभी दलों को उनके नेतृत्व में मजबूती से चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। कांग्रेस अपने रुख में लचीलापन लाते हुए जमीनी हकीकत को समझे।
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