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Thursday, April 16, 2020

लॉकडाउन से कम खेतों में तैयार खड़ी रबी फसलों की चिंता से ज्यादा परेशान हैं जिले के किसान

जिले में कोरोना के मरीज की पुष्टि होने के बाद चारों ओर खौफ दिखने लगा है। दोपहर में जैसे ही लोगों को इस बात की सूचना मिली सभी घरों में कैद होने लगे। यहां तक कि कोरोनावायरस का खौफ गांव-गांव तक फैल चुका है। लेकिन, इन सब के बीच में भी किसानों को इससे अधिक अपनी फसल की चिंता सता रही है। पहले बेमौसम बरसात और फिर ओला गिरने से फसलों को हुए नुकसान से परेशान किसान अब खेत में बची फसल की कटाई को लेकर चिंतित हैं। दिहाड़ी मजदूरों पर भी इसका असर अधिक पड़ रहा है।

लाॅकडाउन की वजह से गांव में मजदूर मिल नहीं रहे हैं। जब सरकार के निर्देश पर हार्वेस्टर से गेहूं कटाई की बात हुई तो सरकार ने दूसरे प्रदेश के हार्वेस्टर चालकों के आने की अनुमति तो दे दी, लेकिन बाहर से आए हर हार्वेस्टर चालकों को क्वारंटीन कर दिया गया। ऐसा नहीं करने वाले हार्वेस्टर मालिकों पर मुकदमा दर्ज करने की बात कही जा रही है। यही कारण है कि खेतों में गेहूं की फसल पककर तैयार है और हार्वेस्टर भी खड़ी है। लेकिन कटाई नहीं हो पा रही है।

अगर मौसम का मिजाज बदला तो खेतों में ही करोड़ों रुपए का अनाज चौपट हो जाएगा। इस सवाल पर न तो सरकार संवेदनशील है और न ही अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि ही। बहुत से हार्वेस्टर चालक लॉकडाउन के कारण अभी तक नहीं पहुंचे हैं। जो आ गए हैं, उन्हें प्रशासनिक निर्देश के आधार पर 14 दिन के लिए क्वारंटीन में रख दिया गया है। 14 दिन बाद उन्हें पुनः वापस भेज देने की बात कही जा रही है। ऐसी हालत में हार्वेस्टर मालिक के साथ-साथ किसानों के सामने विकट समस्या पैदा हो गई है।
एक गाड़ी पर दो से तीन चालक की जरूरत
हार्वेस्टर मालिक पास बनवाकर 30 से 40 हजार रुपये खर्च कर पंजाब व हरियाणा से चालक व खलासी ले आए। अब किसानों को समझ में नहीं आ रहा है कि गेहूं की कटनी कैसे होगी। दुर्गावती प्रखंड समेत जिले में हार्वेस्टर चालकों की संख्या नाम मात्र की है। जबकि एक गाड़ी पर दो से तीन चालक की जरूरत होती है। कई हार्वेस्टर मालिकों व किसानों ने कहा कि हार्वेस्टर चालकों की स्वास्थ्य जांच कराकर उन्हें गेहूं कटनी का अनुमति दी जानी चाहिए। किसानों की इस समस्या पर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पूर्व सदस्य टीएन चौबे ने कहा कि लॉक डाउन पालन करने का विपक्ष हिमायती है। लेकिन गेहूं की फसल की कटाई के लिए केवल एक पखवारा ही बचा है। हार्वेस्टर चालकों को क्वारिन्टाइन किए जाने से बेहतर है कि सभी की जांच कराई जाय। जांच रिपोर्ट नेगेटिव आने पर उनको हार्वेस्टर चलाने की अनुमति सरकार दे।
बाजारों में आढ़त बंद हाेने से बढ़ी मुश्किल : कहने को तो किसानों को अन्नदाता कहा जाता है। सरकारी स्तर पर किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने की बात कही जाती है। पैक्स समितियों के माध्यम से समय से गेहूं की खरीद शुरु की जाती, तो प्रति कुंटल किसानों को 175 रुपये का नुकसान नहीं होता। किसानों ने बताया कि कोरोना संक्रमण को लेकर बाजारो में आढ़त बन्द है। सरकारी स्तर पर गेहूं की खरीद शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। प्रखंड या पंचायतों में अनाज भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं है। मजबूरन किसान फसल कटते की उपज बेचने के प्रयास में लग जाते है। अगर पैक्स समितियों के माध्यम से गेहूं की खरीद शुरु की जाती, तो कुछ हद तक किसानों को राहत मिलती।

1750 रुपये के दर से खुले बाजार में बेच रहे हैं
कोरोनावायरस की आफत झेल रहे किसान किसी तरह से गेहूं की कटनी शुरु कर अपनी उपज की अच्छी कीमत के इंतजार में हैं। इधर, सहकारिता विभाग के द्वारा गेहूं की खरीद करने के लिए पैक्स समितियों को अब तक कोई निर्देश नहीं मिला है। मजबूरन किसान सस्ते दर पर गेहूं की उपज किसी तरह से बेचने को मजबूर हो रहे हैं। बता दें कि सरकार के द्वारा गेहूं खरीद का मूल्य प्रति कुंतल 1925 रुपये निर्धारित किये गए है। फिलहाल किसान प्रति कुंटल 175 रुपये का नुकसान झेलते हुए 1750 रुपये के दर से खुले बाजार में बेच रहे हैं। जबकि कोरोना की वजह से लागू लॉक डाउन की वजह से बाज़ार में आढ़त (गोला) भी बन्द है। कोई व्यवसाईकिसानों के खेतों खलिहानों में जाकर गेहूं की खरीद कर तो रहा है लेकिन लॉक डाउन के वजह से बाज़ार बन्द होने का हवाला दे किसान को उचित मूल्य देने में असमर्थता जता रहा है। जानकारों का कहना है कि सरकार के द्वारा गेहूं की खरीदारी शुरु होते ही खुले बाजार में गेहूं की कीमत बढ़ जाती है। पिछले वर्ष भी शुरुआती दौर में खुले बाजार में गेहूं की कीमत कम थी। लेकिन सरकार के द्वारा खरीदारी शुरु होते ही बाजार भाव में उछाल आ गया।



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The farmers of the district are more worried about the rabi crops ready in the fields less than the lockdown


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