(अजय कुमार सिंह)13 साल दिव्यांश (बदला नाम) के लिए जिस दिन पिता ने साइकिल खरीदी, उसी दिन लॉकडाउन हुआ। बच्चा 7 दिन में चिड़चिड़ा हो गया। उग्र व्यवहार के साथ ही जब उसे सांस लेने में भी परेशानी हुई तो परिजन उसे लेकर आईजीआईएमएस पहुंचे। 14 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। मेडिसीन, न्यूरो में दिखाने के बाद डॉक्टरों ने उसे साइकेट्री के पास रेफर कर दिया। अब सुधार है। यह एक केस है। ऐसे मामले लगातार मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं।
लॉकडाउन की वजह से अभी अस्पताल तक पहुंचने वालों की संख्या कम है। ऐसे में डॉक्टर बच्चों से ज्यादा माता-पिता की काउंसलिंग पर फोकस कर रहे हैं। कोरोना के आतंक और लॉकडाउन की वजह से कमोवेश सभी लोग इस हालात से गुजर रहे हैं। इससे बच्चे भी अछूते नहीं हैं। 10 से 15 साल के बच्चों की बाहरी गतिविधियां अचानक बंद हो गई हैं। इस वजह से उनकी फिजिकल एनर्जी चैनेलाइज नहीं हो पा रही है। बड़ों के लिए मोबाइल-मूवी-ऑनलाइन गेम में रोकटोक नहीं, लेकिन बच्चों को तो हम टोकते रहते हैं। ये सही भी है, लेकिन इसके भी साइड इफेक्ट हैं। ऐसे में उनमें एक कुंठा घर कर जाती है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, आक्रामक स्वभाव, गुस्सा देखने को मिल रहा है।
बच्चों पर असर क्यों? : स्कूल बंद है, बाहर खेलना भी बंद। दिन भर टीवी पर एक ही चीज देखकर ऊब गए हैं। वैसे भी यह सबके लिए असामान्य स्थिति है। बड़ों में भय, आतंक, चिंता, तनाव बढ़ जाता है। इसका असर बच्चों पर पड़ता है। बच्चों में एनर्जी का सही दिशा में खर्च नहीं होने पर उसके साइड इफेक्ट के रूप में चिड़चिड़ापन, उग्र स्वभाव, झगड़ना आदि है।
माता-पिता करें क्या?
मनोबल को कमजोर नहीं होने दें
डरो मत सचेत रहो की नीति अपनाएं। बच्चों के साथ जितना समय व्यतीत करेंगे, उतना बेहतर है। बच्चों के साथ इंडोर गेम खेलें। बच्चों की बातों को सुनें और समाधान बताएं। उनकी जिज्ञासा का पता करें। बच्चें को नए हॉबी के लिए प्रेरित करें। पौष्टिक आहार दें, जिससे इम्युनिटी बढ़े। पूरी नींद लेने दें।
(पीएमसीएच के मनोचिकित्सा विभाग के हेड डॉ. पीके सिंह, आईजीआईएमएस के हेड डॉ. राजेश कुमार और पटना एम्स के हेड डॉ. पंकज कुमार से बातचीत के आधार पर)
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